आपको बता दे कि भारत में करीब 600 नेशनल हाईवे हैं और 44 एक्सप्रेस-वे हैं आमतौर पर लोग इन्हें एक जैसा ही समझते हैं, लेकिन तकनीकी तौर पर इनमें कई अंतर होते हैं सबसे बड़ा अंतर है एक्सेस कंट्रोल का।
नेशनल हाईवे और एक्सप्रेस-वे में क्या अंतर है?
पहला अंतर
पहला अंतर यह है कि हाईवे पर कहीं भी बीच रास्ते में गाड़ी को चढ़ाना और उतारना आसान होता है, लेकिन एक्सप्रेस-वे पूरी तरह से कंट्रोल्ड होते हैं इनमें तय एंट्री और एग्जिट पॉइंट्स से ही गाड़ियां आती हैं और जा सकती हैं।
दूसरा अंतर
इनकी संख्या का अंतर भी फर्क पैदा करता है भारत में करीब 600 नेशनल हाईवे हैं और 44 एक्सप्रेस-वे. इस तरह देश में हाईवे का नेटवर्क बेहद बड़ा होता है मतलब की हाईवे की संख्या ज्यादा है और एक्सप्रेस में कम हैं
देश का सबसे लंबा नेशनल हाईवे NH 44 है, जो श्रीनगर से कन्याकुमारी तक जाता है लेकिन एक बात साफ है कि देश में बढ़ रहे हाईवे और एक्सप्रेस-वे सफर को आसान जरूर बना रहे हैं।
तीसरा अंतर…
तीसरा अंतर लेन का होता है हाईवे पर आमतौर पर 2 से 4 लेन ही होती हैं ये गांव, कस्बों और शहरों को जोड़ती हैं हाईवे अक्सर घनी आबादी वाले रास्ते से होकर गुजरते हैं चौराहे, मोड़ के साथ इनके रास्ते में रुकावटें आ सकती हैं वहीं, एक्सप्रेस-वे को खासतौर पर तेज रफ्तार के लिए डिजाइन किया गया है, जहां रास्ते में बाधा न हों एक्सप्रेस-वे में 6 से 8 लाइनें होती हैं ।
चौथा अंतर… यदि हम बनावट और मजबूती की तुलना करें तो एक्सप्रेस-वे की बनावट और मजबूती हाईवे से ज्यादा बेहतर होती है एक्सप्रेस-वे में रुकावट न होने के कारण इसे डिजाइन ही तेज गति के लिए किया जाता है. इसलिए यहां स्पीड लिमिट भी ज्यादा रखी जाती है वहीं, नेशनल हाईवे पर सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के नियमों के मुताबिक अधिकतम रफ्तार सीमा आमतौर पर कम रखी जाती है, क्योंकि इन पर स्थानीय ट्रैफिक, पैदल यात्री और छोटे वाहन भी चलते हैं।
दोनों को बनाने के मकसद में भी बारीक सा अंतर है हाईवे के निर्माण का उद्देश्य दूर-दराज के इलाकों, गांवों और शहरों को आपस में जोड़ना है ताकि आम जनता की रोजमर्रा की आवाजाही को आसान बनाया सकें वहीं, एक्सप्रेस-वे दो बड़े शहरों के बीच की दूरी को कम करने के लिए बनाए जाते हैं यानी लम्बी दूरी को कम समय में तय करने के लिए बनाया जाता है।
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